कृष – राधिका ( एक प्यार… जो बिना प्रपोज़ल शुरू हुआ और बिना ब्रेकअप खत्म हो गया ) | Real Life Story | Twin Flame Story


कृष भगवान को बिल्कुल नहीं मानता था।

उसके लिए भगवान सिर्फ कहानियाँ थे — असली ज़िंदगी में सिर्फ मेहनत और लॉजिक चलता है, यही उसका मानना था।


एक दिन कृष अपनी बाइक से इंटरव्यू के लिए जा रहा होता है।

उसे पुल (ब्रिज) से शॉर्टकट लेना होता है।


तभी रास्ते में एक लड़का कहता है,

“भैया, राधा-कृष्ण मंदिर तक लिफ्ट दे दो।”


कृष चिढ़कर बोलता है,

“मैं उधर से नहीं जा रहा।”


लड़का हल्की सी मुस्कान के साथ कहता है,

“बस थोड़ा सा घूमना पड़ेगा।”


पता नहीं क्यों… कृष बाइक मोड़ देता है।


मंदिर के पास लड़का उतरता है और भीड़ में कहीं खो जाता है।


घर पहुँचते ही कृष का भाई घबराकर बोलता है,

“तू ज़िंदा कैसे है?! जिस पुल से तू जाने वाला था… वो गिर गया!”


कृष का दिमाग सुन्न हो जाता है।

उसे तुरंत उस लड़के की बात याद आती है।


वो वापस जाकर देखता है —

वहाँ एक मोरपंख पड़ा होता है।


कृष पहली बार चुप हो जाता है…

लॉजिक हार चुका होता है।



राधिका का आना


अगले दिन घर वाले कृष को मंदिर छोड़ने को कहते हैं।

वो सिर्फ बाहर खड़ा रहता है। कृष की मां पंडित जी से कहती है कि पंडित जी यह लड़का तो मंदिर के अंदर आता ही नहीं है यह कैसे मंदिर के अंदर आएगा और यह पूजा पाठ करेगा |



Real Life Story | TwinFlame Story
Twin Flame Story ( Real Life Story )



पंडित जी कहते हैं,

“माता जी, इसे मंदिर तक लाने वाली नहीं बल्कि इसे…

वृंदावन तक ले जाने वाली इसकी ज़िंदगी में बहुत जल्द आने वाली है।”


कृष हँसी में टाल देता है।


और फिर… राधिका उसकी ज़िंदगी में आती है।


एक दिन ऑफिस के बाहर पार्किंग को लेकर झगड़ा हो जाता है।

तेज़ आवाज़… तेज़ गुस्सा।


बाद में पता चलता है —

ये कंपनी राधिका के पापा की है।


कृष ईगो में आकर

उसी कंपनी में मैनेजर/एम्प्लॉयी के रूप में जॉइन कर लेता है —

सिर्फ उसे नीचा दिखाने के लिए।


राधिका —

(कंपनी ओनर की बेटी, कॉन्फिडेंट, गुस्सैल,

और कृष्ण की गहरी भक्त। )


कृष उसे हर तरह से परेशान करता है —

मीटिंग्स, टार्गेट्स, ताने।


पर कर्मचारियों के लिए वो एक अच्छा इंसान होता है।

वो उनकी मदद करता है, उनका साथ देता है।


धीरे-धीरे कंपनी के लोग कृष को रिस्पेक्ट देने लगते हैं।


बदलाव


एक दिन कृष देखता है —

राधिका के चेहरे पर चोट के निशान…

और आँखों में अजीब सी थकान।


पता चलता है —

फैमिली और बिज़नेस का दबाव।


उस दिन के बाद कृष बदलने लगता है।


बिना बताए…

बिना जताए…

राधिका का ख्याल रखने लगता है।


एक दिन कह देता है,

“तुम धीरे-धीरे मेरी ज़िंदगी में ऐसी हो रही हो…

जैसे राधा, कृष्ण के लिए।”


राधिका चुप हो जाती है।

थोड़ी दूर हो जाती है।


कृष पूछता है,

“राधा बार-बार कृष्ण को छोड़कर क्यों चली जाती थी?”


राधिका कहती है,

“पर कृष्ण ने कभी राधा का साथ नहीं छोड़ा।”


ये लाइन कृष के दिल में बैठ जाती है।


उसी दिन से वो मंदिर जाने लगता है।

सोमवार का व्रत रखता है।

और राधिका के कहने पर

कंपनी ट्रिप वृंदावन प्लान करता है।


वहाँ…

दोनों बिना बोले सब कह देते हैं।


न प्रपोज़ल…

न प्रॉमिस…

सिर्फ एहसास।


अलग होना (बिना ब्रेकअप)


वृंदावन के बाद सच सामने आता है।


राधिका के पापा कंपनी किसी और शहर शिफ्ट करने का निर्णय ले लेते हैं।

साथ ही राधिका की शादी की बातें भी शुरू हो जाती हैं।


कृष सब जानता है…

पर कुछ नहीं कहता।


कंपनी का आख़िरी वर्किंग डे आता है।


राधिका कृष से पूछती है,

“तुमने मुझे कभी रोका क्यों नहीं?”


कृष धीरे से बोलता है,

“अगर रोका होता…

तो तुम्हें अपनी ज़िंदगी छोड़नी पड़ती।

और मैं वो प्यार नहीं कर सकता जो बोझ बन जाए।”


राधिका अपना राधा-कृष्ण पेंडेंट

कृष के हाथ में रख देती है।


“अगर भगवान कभी तुम्हारी बात न सुने…

तो इसे देख लेना।”


आख़िरी मुलाक़ात


एयरपोर्ट पर भीड़ होती है।


दोनों एक-दूसरे को देखते हैं…

पर पास नहीं जाते।


राधिका सिर्फ इतना कहती है,

“सोमवार का व्रत छोड़ना मत।”


कृष कहता है,

“और तुम… कृष्ण से नाराज़ मत होना।”


प्लेन उड़ जाता है।


ब्रेकअप कभी हुआ ही नहीं…

बस ज़िंदगी आगे बढ़ गई।


अंतिम मोड़ (रुला देने वाला)


सालों बाद वृंदावन में…


कृष को बेस्ट मैनेजर अवॉर्ड मिलता है।

आरती के वक्त उसका हाथ किसी से टकराता है।


दोनों एक साथ बोलते हैं,

“सॉरी।”


सामने…

राधिका।


न गले मिलना…

न लंबी बातचीत।


राधिका कहती है,

“तुम अब भी…?”


कृष बस कहता है,

“हाँ।”


मंदिर की घंटी बजती है।

और पास ही दो मोरपंख गिरते हैं।


कृष मुस्कुराता है —

आँखों में आँसू के साथ।


आख़िरी पंक्ति


कुछ लोग प्यार बन कर हमारी जिंदगी में हमेशा के लिए रहने नही आते.....

बल्कि वो हमारी जिंदगी में हमे बेहतर इंसान बनाने के लिए आते हैँ |


समाज और सोच से जुड़े प्रश्न

क्या आज के समय में बिना “प्रपोज़” और “रिलेशनशिप स्टेटस” के भी सच्चा प्यार हो सकता है?

क्या परिवार और समाज का दबाव अक्सर सच्चे रिश्तों को अधूरा छोड़ देता है?

क्या करियर और बिज़नेस की महत्वाकांक्षा के बीच भावनाओं की जगह बचती है?

क्या ईगो (अहम) प्यार का सबसे बड़ा दुश्मन है?

क्या लड़कों का चुपचाप त्याग करना समाज में समझा जाता है?

क्या हर प्यार का अंत शादी होना ही ज़रूरी है?

क्या भगवान और आध्यात्मिकता किसी इंसान को अंदर से बदल सकते हैं?

क्या कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में हमेशा के लिए रहने नहीं, बल्कि हमें बेहतर बनाने के लिए आते हैं?

क्या “बिना ब्रेकअप के अलग हो जाना” भी एक तरह का परिपक्व प्यार है?

अगर आप कृष की जगह होते — क्या राधिका को रोकते?


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